चरित्रहीन:हिंदी कहानी!
चरित्रहीन:हिंदी कहानी!

चरित्रहीन:हिंदी कहानी!

चरित्रहीन:हिंदी कहानी!

इन्हीं सिपाहियों में आशा भी एक थी. जब वह पहरेदारी करते हुए एक बैरक से हो कर गुजरने लगी तो एक कैदी ने उसे धीमी आवाज में पुकारा.

रात के 10 बज रहे थे. जेल में चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था. कैदियों को उन के बैरकों में भेज दिया गया था और अब तक उन में से ज्यादातर सो गए थे, तो कुछ सोने की तैयारी कर रहे थे. जेल में गश्ती दल के सिपाही गश्त पर निकल गए थे.
इन्हीं सिपाहियों में आशा भी एक थी. जब वह पहरेदारी करते हुए एक बैरक से हो कर गुजरने लगी तो एक कैदी ने उसे धीमी आवाज में पुकारा.
आवाज सुन कर आशा के पैर ठिठके और वह बैरक के लोहे के दरवाजे पर आ खड़ी हुई. लोहे के दरवाजे के उस पार उसे पुकारने वाला कैदी खड़ा था.
‘‘क्या है रमेश, तुम ने मुझे क्यों पुकारा?’’ आशा धीमी आवाज में बोली.
यह पूछते हुए आशा की निगाहें कैदी के दोहरे बदन पर फिसल रही थीं और आंखों में तारीफ के भाव उभरे हुए थे.
‘‘सुन, मुझे बाहर एक संदेश पहुंचाना है,’’ रमेश यादव बोला.
‘‘लगता है, किसी दिन तुम मुझे  फंसवा दोगे. तुम नहीं जानते, अगर किसी को इस बात का पता चल गया कि मैं तुम्हारे साथियों को बाहर तुम्हारा संदेशा पहुंचाती हूं तो मेरी अच्छीखासी नौकरी पर बन आएगी.’’

‘‘तुम्हारे साथ ऐसा कुछ नहीं होगा…’’ रमेश यादव बोला, ‘‘फिर मैं तुम्हें इस की कीमत भी तो देता हूं.’’
‘‘तुम क्या समझते हो कि मैं इस कीमत के लालच में तुम्हारा काम करती हूं,’’ आशा ने कहा.
‘‘फिर किसलिए करती हो?’’ कहते हुए रमेश यादव के होंठों पर एक हलकी सी मुसकान उभरी.
‘‘तुम्हारा यह कसरती बदन और खूबसूरत थोबड़ा मुझे पसंद आ गया है इसलिए,’’ कहते हुए आशा मुसकराई.
‘‘तू भी कुछ कम खूबसूरत और मादक नहीं है,’’ रमेश यादव ने उस के हसीन चेहरे और गदराए बदन पर एक नजर डाली.
‘‘मतलब, मैं तुम्हें पसंद हूं?’’
‘‘बहुत…’’ रमेश यादव बोला, ‘‘मैं खुद तुम्हें पाने को बेचैन हूं. पर तू फिक्र न कर. मेरे साथी जल्द ही मुझे यहां से निकाल लेंगे. फिर तो हम खुल कर एकदूसरे से मिल सकेंगे.’’
‘‘न जाने वह दिन कब आएगा,’’ आशा एक सर्द आह भर कर बोली.

जल्द आएगा…’’ रमेश यादव बोला, ‘‘खैर, मेरा यह संदेश का पुरजा इस पर लिखे पते पर पहुंचा देना.’’
आशा ने एक सतर्क निगाह चारों तरफ डाली, फिर हाथ बढ़ा कर पुरजा थाम लिया और तेजी से आगे बढ़ गई. आगे एक सुनसान जगह पर पहुंच कर उस ने पुरजा खोला तो उस में 100 रुपए का एक नोट रखा था. उस ने नोट अपनी कमीज की जेब के हवाले किया, फिर उस पुरजे को अंदर की जेब में रख कर जेल का चक्कर काटने लगी.
आशा 35 साला गदराए बदन और खूबसूरत चेहरे की थी. 10 सालों से वह पुलिस में थी और 6 महीने पहले रमेश यादव इस जेल में आया था. दोहरे बदन, मोहक चेहरेमोहरे के इस अपराधी ने जब शुरूशुरू में उस से जानपहचान करने की कोशिश की तो आशा थोड़ी हिचकी थी, फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि वह उस से जानपहचान करती चली गई.
शायद कसरती बदन और सलोना चेहरा उसे भा गया था या फिर अपने साथियों को संदेश पहुंचाने के एवज में वह उसे पैसे जो देता था.
रमेश यादव अपने क्षेत्र का एक बदनाम अपराधी था और दुकानदारों और कारोबारियों से रंगदारी वसूलता था. उस के साथी जान से मारने या जख्मी करने से नहीं हिचकते थे.
रमेश यादव का जेल में आनाजाना लगा रहता था. पर, चाहे वह जेल के बाहर रहता या अंदर, हर हाल में उस का धंधा चलता रहता. उस के जेल में रहने की हालत में उस के साथी उस की चिट्ठी ले कर उस के बताए दुकानदार और कारोबारी के पास पहुंचते और उस के डर से दुकानदार या कारोबारी उस के द्वारा मांगी गई रकम उस के साथी को दे देते.
रमेश यादव की ऐसी ही चिट्ठियां आशा उस के साथियों तक पहुंचाने लगी. लेनदेन में दोनों शारीरिक रूप से भी एकदूसरे की ओर खिंचते चले गए थे.
जहां आशा को रमेश का दोहरा बदन ललचाता था, वहीं रमेश आशा के गदराए मादक बदन को अपनी बांहों में समेटने का ख्वाब देखता था.
कुछ सप्ताह बाद आशा का फोन बजा,

‘हैलो.’
‘‘कौन?’’
‘मैं रमेश यादव बोल रहा हूं.’
‘‘अब याद आई है मेरी…’’ आशा अपनी आवाज में नाराजगी घोलते हुए बोली, ‘‘जबकि तुम 10 दिन पहले ही जेल से बाहर आ चुके हो.’’
‘नाराज मत हो यार…’ उधर से रमेश यादव की मनुहार भरी आवाज सुनाई पड़ी, ‘जेल जाने के कारण बहुत सारा काम पैंडिंग पड़ा था, उन्हें निबटाने में उलझ गया था. इन से जैसे ही फुरसत मिली, तुम्हें फोन किया.’
‘‘फोन कैसे किया?’’
‘अरे यार, तुझ से मिलने के लिए मन बेचैन है.’
‘‘बेचैन तो मैं भी हूं.’’
‘फिर तो ऐसा कर, आज शाम
मुझ से मिल. हम दोनों मिल कर अपनीअपनी बेचैनी मिटाएंगे,’ कह कर रमेश यादव हंसा.
‘‘कहां…?’’
‘तू किसी जानीपहचानी जगह पर तो मुझ से मिल नहीं सकती.’
‘‘फिर…?’’
‘मेरे फार्महाउस पर चली आ.’
‘‘पता बोल.’’
रमेश यादव ने पता बतलाया.
‘‘ठीक है, मैं शाम को साढ़े 5 बजे तक वहां पहुंच जाऊंगी.’’
‘अच्छी बात है.’ रमेश यादव बोला.
अपने वादे के अनुसार आशा साढ़े 5 बजे रमेश यादव के फार्महाउस पर पहुंच गई. दरवाजे पर खड़े दरबान ने उसे रमेश यादव के कमरे में पहुंचाया.
आशा को देखते ही रमेश यादव खुशदिली से बोला, ‘‘आओ आशा, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.’’

आशा सधे हुए कदमों से आगे बढ़ी और आ कर उस बिछावन पर बैठ गई जिस पर रमेश यादव शराब की बोतल खोले बैठा था.
‘‘यकीन करो आशा, तुम्हारे इंतजार में शराब पीने का मजा ही नहीं आ रहा था. अब तुम आ गई हो तो पीने का असली मजा आएगा.’’

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जरूर…’’ आशा उसे कातिल नजरों से देखती हुई बोली, ‘‘मैं तुम्हें अपने हाथों से पिलाऊंगी,’’ कहते हुए आशा ने वहां पड़े शीशे के गिलास में शराब डाली, फिर उसे रमेश यादव की ओर बढ़ाया.
‘‘ऐसे नहीं.’’
‘‘फिर?’’
‘‘पहले तुम अपने होंठों का रस इस में घोलो. यकीन मानो, शराब का नशा दोगुना हो जाएगा.’’
आशा ने गिलास से एक घूंट भरा, फिर गिलास रमेश यादव के होंठों से लगा दिया. एक ही सांस में रमेश यादव ने गिलास खाली किया, फिर वह हसरतभरी नजरों से आशा के गदराए बदन को देखने लगा. ऐसे में जब आशा ने दोबारा गिलास भरा तो वह बोला, ‘‘ऐसे दूरदूर से मत पिला. जरा मेरे करीब आ जा.’’
बदले में आशा अपनी टांगें फैला कर उस की गोद में आ बैठी, फिर गिलास उस के होंठों से लगाया. अब की बार रमेश यादव ने जरा भी जल्दीबाजी नहीं की बल्कि घूंटघूंट शराब चुसकने लगा.
दूसरी ओर रमेश यादव के हाथ आशा के बदन की ऊंचाइयांगहराइयां नाप रहे थे. अपने बदन पर रमेश यादव के बेताब हाथों की छुअन पा कर आशा बेहाल होने लगी. ऐसे में उस ने अपने हाथ का गिलास फर्श पर टिकाया, फिर रमेश यादव को बिछावन पर लिटा कर उस को बेताबी से चूमने लगी.

आशा की इस हरकत से रमेश यादव के तनबदन में वासना के शोले भड़कने लगे और उस ने अपने ऊपर सवार आशा की कमर के इर्दगिर्द अपनी बांहें कस दीं.
इस के बाद तो आशा अकसर रमेश यादव से मिलने लगी. रमेश यादव न सिर्फ भरपूर जिस्मानी सुख देता था, बल्कि उस पर दोनों हाथों से पैसे भी लुटाता था.
आशा तो पहले ही अपने पति से खुश नहीं थी, रमेश यादव जैसा प्रेमी पा कर उस की ओर से आशा और भी लापरवाह हो गई. जेल की नौकरी में पैसा और रिश्वत दोनों मिलते थे, पर इतने नहीं.
त्रिया चरित्र भाग-2
आशा के पति रतनलाल ने जब उस में आए इस बदलाव को महसूस किया तो उस का माथा ठनका. रतनलाल को लगा कि हो न हो, आशा ने घर से बाहर अपना कोई यार पाल लिया है.

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आशा के पति रतनलाल ने जब उस में आए इस बदलाव को महसूस किया तो उस का माथा ठनका. रतनलाल को लगा कि हो न हो, आशा ने घर से बाहर अपना कोई यार पाल लिया है.
एक रात को वह आशा से बोला, ‘‘आशा, आजकल तू किस दुनिया में रह रही है?’’
पति रतनलाल के इस सवाल पर आशा चौंकी, पर जल्द ही अपनेआप
को संभालते हुए वह बोली, ‘‘क्या मतलब…?’’
‘‘मैं देख रहा हूं कि आजकल तेरे तो रंगढंग ही बदल गए हैं. तू यह बात बिलकुल भूल गई है कि घर में तेरा एक पति भी है. रात को जब मैं तुझे हाथ लगाता हूं तो तू मेरा हाथ झटक देती है. कहीं तू ने घर के बाहर अपना कोई यार तो नहीं पाल लिया है?’’

मन ही मन डरती आशा तेज आवाज में बोली, ‘‘तुम्हें अपनी पत्नी से ऐसी बातें करते हुए शर्म नहीं आती? यह सीधासीधा मेरे चरित्र पर लांछन है.’’
‘‘अच्छा होगा, यह लांछन ही हो. मगर हकीकत में बदला तो याद रख. मैं तेरा जीना हराम कर दूंगा,’’ रतनलाल उसे घूरता हुआ बोला.
पति रतनलाल के शक को देखते हुए आशा कुछ दिनों तक रमेश यादव से मिलने में सावधानी बरतती रही और जब उसे पक्का यकीन हो गया कि रतनलाल उस की ओर से बेपरवाह हो गया है तो फिर से खुल कर उस से मिलने लगी.
पर रतनलाल उस की ओर से लापरवाह नहीं हुआ था, बल्कि चोरीछिपे उस की हरकतों पर नजर रख रहा था.
कुछ ही दिन के बाद रतनलाल को मालूम हो गया कि आशा ने रमेश यादव नामक के एक अपराधी से यारी गांठ ली है और उस के साथ मिल कर रंगरलियां मनाती है.

सचाई जानते ही उस का खून खौल उठा. एक रात जब वह घर लौटी, तो रतनलाल बोला, ‘‘कहां से आ रही है तू?’’
‘‘पुलिस स्टेशन से.’’

पता है, इस समय रात के 11 बज रहे हैं?’’ रतनलाल उसे घूरता हुआ बोला, ‘‘मैं ने पुलिस स्टेशन फोन किया था. मालूम हुआ कि तू वहां से शाम 7 बजे ही निकल गई थी.’’
‘‘रास्ते में एक सहेली मिल गई थी. उसी के साथ उस के घर चली गई थी,’’ आशा उस से नजरें चुराते हुए बोली.
‘‘और तुम्हारी उस सहेली का नाम रमेश यादव है?’’ रतनलाल गुस्से से चिल्लाया, ‘‘यह कहते हुए तेरी रूह कांपती है कि तू अपने इसी यार के साथ रंगरलियां मना कर वापस लौट रही है.’’
आशा बौखलाई हुई सी उसे देखती रह गई.
‘‘बोलती क्यों नहीं?’’
‘‘यह सरासर झूठ है,’’ आशा कांपती हुई आवाज में बोली.
बदले में रतनलाल उस की ओर लपका, फिर उस के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करता हुआ बोला, ‘‘तू क्या समझती है, मैं अंधा और
बहरा हूं. मुझे कुछ भी दिखाई या सुनाई नहीं देता?
‘‘जानती है, जिस रमेश यादव की तू आजकल प्यारी बनी हुई है, उस के फार्महाउस का गार्ड मेरा दोस्त है. कल वह मजे लेले कर कह रहा था कि उस के साहब ने आजकल एक रखैल पाल रखी है जिस का नाम आशा है और वह घंटों उस की बांहों में झूलती वासना का नंगा खेल खेलती है.’’
आशा के मुंह से बोल नहीं फूटे. दूसरी ओर गुस्से से पागल हुआ पति रतनलाल उसे पीटता चला गया.
रतनलाल उसे पीट कर घर से निकल गया, पर आशा घंटों बेइज्जती और बदले की आग में जलतीसिसकती रही.
अगली मुलाकात में रमेश यादव से जब आशा ने ये सारी बातें कहीं, तो वह गुस्से से उबलता हुआ बोला, ‘‘उस की यह हिम्मत कि वह रमेश यादव की यार पर हाथ उठाए, पर तुम फिक्र न करो. मैं जल्द ही इस का इलाज कर दूंगा. बस, तुम्हें मेरा साथ देना होगा.’’
आशा ने उसे इस की सहमति दे दी

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आशा के घर के दरवाजे पर एक खास अंदाज में थाप पड़ी. इसे सुनते ही बिछावन पर आंखें मूंदे लेटी आशा ने अपनी आंखें खोल दीं. वह चुपके से बिछावन से उतरी, फिर बिछावन पर गहरी नींद में सोए रतनलाल पर एक गहरी नजर डालने के बाद दरवाजे की ओर बढ़ गई. उस ने जब दरवाजा खोला तो रमेश यादव जल्दी से अंदर आता हुआ बोला, ‘‘कहां है?’’
‘‘अपने कमरे में गहरी नींद में सोया पड़ा है.’’
‘‘चलो,’’ रमेश यादव बोला.
आशा ने अंदर से दरवाजा बंद कर दिया, फिर कमरे में आ गई. कमरे में बिछी चारपाई पर पति रतनलाल दीनदुनिया से बेखबर सो रहा था.
बिछावन के पास पहुंच कर रमेश यादव ने आंखों ही आंखों में आशा को कुछ इशारा किया, फिर चुपके से वह बिछावन पर चढ़ गया. उस ने रतनलाल के बगल में पड़ा तकिया उठा कर उस के मुंह पर रखा, फिर उस के सीने पर सवार हो कर अपनी हथेलियों का पूरा वजन तकिए पर डाल दिया.
दबाव पड़ते ही रतनलाल ने अपनी आंखें खोल दीं. ऐसे में जब उस की नजर अपने सीने पर सवार रमेश यादव पर पड़ी तो हैरानी से उस की आंखें फटती चली गईं. उसे समझते देर न लगी कि रमेश यादव उस का गला घोंटना चाहता है. यह समझते ही उस की आंखों में खौफ के भाव उभरते चले गए और वह उस के चंगुल से छूटने के लिए अपने हाथपैर पटकने लगा.

उस के ऐसा करते ही रमेश यादव बिछावन के पास ही खड़ी आशा से बोला, ‘‘इस के पैर पकड़ो आशा.’’
पर ऐसा लगा, जैसे आशा ने उस की बात सुनी ही न हो. वह मूर्ति बनी कभी रतनलाल के सीने पर सवार, उस का गला घोंटते रमेश यादव को देख रही थी, तो कभी हाथपैर पटकते रतनलाल को.
सच तो यह था कि इस समय उस के दिलोदिमाग में एक भयानक लड़ाई चल रही थी. एक औरत और एक पत्नी में धीरेधीरे पत्नी का पलड़ा भारी पड़ता चला गया और आशा सोचने लगी कि चाहे रतनलाल कैसा भी है, पर है तो उस का पति ही. उस का और उस के बच्चे का भविष्य उसी के साथ सुरक्षित था.
दूसरी ओर रमेश यादव एक अपराधी था और इस समय भी एक अपराध करने जा रहा था. वह उसे भी इस अपराध में शामिल करना चाहता था.
पुलिस में होने के चलते आशा को यह बात अच्छी तरह से मालूम थी कि अगर उस का यह अपराध उजागर हो जाता तो उस के साथ उस की भी जिंदगी तबाह हो जाती. पर आशा ऐसा हरगिज नहीं चाहती थी, तो फिर…?
जवाब में आशा ने अपनी नजरें कमरे में चारों तरफ दौड़ाईं. उसे कमरे में एक ओर मोटा डंडा पड़ा दिखाई दिया. उस ने डंडा उठाया, फिर रतनलाल का गला घोंटते रमेश यादव के सिर पर पूरी ताकत से दे मारा.

रमेश यादव के मुंह से एक दर्दनाक चीख उभरी. रतनलाल का गला छोड़ वह अपना सिर पकड़ कर वहीं जमीन पर गिर पड़ा. उस का सिर फट गया था और वहां से खून का फव्वारा फूट पड़ा था. कुछ देर तक वह तड़पता रहा, फिर वह मर गया.
एक घंटे बाद आशा के घर में पुलिस वालों की भीड़ लगी हुई थी और उस ने इंस्पैक्टर को यह बयान दिया था कि रमेश यादव उस पर बुरी नजर रखता था जिस का विरोध उस का पति रतनलाल करता था. रमेश यादव उस के घर में घुस आया और उस ने उस के पति का गला घोंट कर मारना चाहा. अपने पति की जान बचाने के लिए उसे रमेश यादव को मारना पड़ा.
जब आशा अपना यह बयान दे रही थी तो रतनलाल हैरत भरी नजरों से उसे देख रहा था.
आशा के इस बरताव ने उसे सकते में ला दिया था और वह यह सोचने पर मजबूर हो गया था कि लोग यह गलत नहीं कहते, ‘औरत का चरित्र इनसान तो क्या कोई नहीं समझ सकता.

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