हिंदी कहानी। बड़े घर की बेटी Hindi Kahani !

हिंदी कहानी। बड़े घर की बेटी Hindi Kahani !

बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार और नंबरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य संपन्न थे। गांव में पक्का तालाब और मंदिर, जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं के कीर्तिस्तंभ थे। बेनीमाधव सिंह अपनी आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे।

उनकी वर्तमान आय एक हज़ार रुपए वार्षिक से अधिक नहीं थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था। उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी० ए० की डिग्री प्राप्त की थी। अब एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लालबिहारी सिंह दोहरे बदन का सजीला जवान था— भरा हुआ मुखड़ा, चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह सवेरे उठकर पी जाता था। श्रीकंठ सिंह की दशा बिलकुल विपरीत थी। इन नेत्रप्रिय गुणों को उन्होंने ‘बी०ए०’–इन्हीं दो अक्षरों पर न्यौछावर कर दिया था। इन दो अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे को

कांतिहीन बना दिया था। श्रीकंठ इस अंगरेज़ी डिग्री के अधिपति होने पर भी पाश्चात्य सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे, बल्कि वे बहुधा बड़े जोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे। दशहरे के दिनों में वे बड़े उत्साह से रामलीला में सम्मिलित होते और स्वयं किसी-न-किसी पात्र का अभिनय करते थे। प्राचीन सभ्यता का गुणगान उनकी प्रकृति का प्रधान अंग था। सम्मिलित कुटुंब के तो वे एकमात्र उपासक थे। आजकल स्त्रियों को कुटुंब में मिल-जुलकर न रहने की जो रुचि होती है, उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गाँव की ललनाएँ उनकी निंदक थीं। कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी सँकोच न करती थी। स्वयँ उनकी पत्नी को इस विषय में उनसे विरोध था। यह इसलिए नहीं कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि से घृणा थी, बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुत कुछ सहने पर भी परिवार के साथ निर्वाह न हो सके तो आए दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही अच्छा है कि अपनी खिचड़ी अलग पकाई जाए।

आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार थे। विशाल भवन, हाथी, कुत्ते, बाज़, झाड़फानूस, आनरेरी मजिस्ट्रेटी और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के भोग्य पदार्थ हैं, सभी यहाँ । विद्यमान थे। उनका नाम था भूपसिंह। बड़े उदार-चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे। पर दुर्भाग्य से लड़का एक भी न था। । आनंदी उनकी चौथी लड़की थी। वह अपनी सभी बहनों से अधिक रूपवती और गुणवती थी। इसलिए ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत । प्यार करते थे। सुंदर संतान को कदाचित उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि आनंदी ।

का विवाह कहाँ करें? न तो यह चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़े और न उन्हें यह स्वीकार था कि उसे अपने को भाग्य समझना पड़े। एक दिन श्रीकंठ सिंह उनके पास किसी चंदे का रुपया मॉगने आए। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गान ‘धूमधाम से श्रीकंठ सिंह का आनंदी के साथ विवाह हो गया। ‘आनंदी अपने नए घर में आई तो यहाँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही पडी हुई थी. वह यहाँ नाममात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का तो कहना ही क्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी. रेशमी स्लीपर साथ लाई थी, पर यहाँ बाग कहाँ, जहाँ वह सैर करती? मकान में खिड़कियाँ तक न थीं, न ज़मीन पर फर्श न दीवार तस्वीरें। यह एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थ का मकान था, किन्तु आनंदी ने थोड़े दिनों में ही अपने को इस नई परिस्थिति के अनुकूल ऐसा बना लिया, मानो विलास के सामान कभी देखे ही न थे।

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एक दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़ियाँ लिए हुए आया और भावज से बोला, “जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है।” आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह नया व्यंजन बनाने बैठी। हाँडी में देखा तो घी पाव भर से अधिक न था। बड़े घर की बेटी, किफ़ायत क्या जाने। उसने सब घी मांस में डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा तो दाल में घी नहीं था तो बोला, “दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा?’ हो गया?” आनंदी ने कहा, “घी सब मांस में पड गया।” लालबिहारी जोर से बोला “अभी परसों घी आया है, इतनी जल्द खत्म आनंदी ने उत्तर दिया, “आज तो कुल पाव भर रहा होगा। वह सब मैंने मांस में डाल दिया।”

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जिस तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य ज़रा-ज़रा सी बात पर तुनक जाता है। लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई। तुनककर बोला, “मैके में तो जैसे घी की नदी बहती हो!” स्त्री गालियाँ सह लेती है, मार भी सह लेती है, पर उससे मैके की निंदा नहीं सही जाती। आनंदी मुँह फेरकर बोली, “हाथी मरा भी तो नौ लाख का। वहाँ इतना घी नित्य नाई-कहार खा जाते हैं।” लालबिहारी जल गया। थाली उठाकर पटक दी और बोला, “जी चाहता है, जीभ खींच लँ।” आनंदी को क्रोध आ गया। मुँह लाल हो उठा। वह बोली, “वे होते तो आज इसका मज़ा चखा देते।” अब अनपढ उजडड लालबिहारी से न रहा गया। खडाऊँ उठाकर आनंदी की ओर ज़ोर से फेंकी और बाला, जसक गुमान पर फूली हुई हो उसे भी देखूगा और तुम्हें भी!’ आनंदी ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी। सिर बच गया. पर अँगली में काफ़ी चोट आई। क्रोध के मारे हवा से हिलते हुए पत्ते को । भाँति काँपती हई अपने कमरे में आकर खड़ी हो गई। स्त्री का बल और साहस, मान और मर्यादा पति तक है। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घमंड होता है। आनंदी खून का चूंट पीकर रह गई।

श्रीकंठ सिंह शनिवार को घर आया करते थे। बृहस्पतिवार को यह घटना घटी थी। दो दिन तक आनंदी कोपभवन में। रही। न कुछ खाया न कुछ पिया, बस श्रीकंठ की बाट देखती रही। अंत में शनिवार को वे नियमानुसार संध्या समय घर आए और बाहर बैठकर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी समाचार तथा कुछ नए मुकदमों आदि की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे रात तक होता रहा। गाँव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने-पीने की भी। सध न रहती थी। श्रीकंठ सिंह को पिण्ड छुड़ाना मुश्किल हो जाता था। ये दो-तीन घंटे आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे। किसी तरह भोजन का समय आया। पंचायत उठ गई। एकांत हुआ तो लालबिहारी ने कहा, “भैया, आप ज़रा भाभी को समझा दीजिएगा कि मुँह सँभालकर बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जाएगा।”

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बेनीमाधव सिंह ने बेटे की ओर से साक्षी दी, “हाँ, बहू-बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दो के मुँह लगें।” लालबिहारी बोला, “वे बड़े घर की बेटी हैं तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं है।” श्रीकंठ ने चिंतित स्वर से पूछा, “आखिर बात क्या हुई?” लालबिहारी ने कहा, “कुछ भी नहीं, यों ही आप उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोगों को तो कुछ समझती ही नहीं।” | श्रीकंठ खा-पीकर आनंदी के पास गए। वह भरी बैठी थी। ये हज़रत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने पूछा, “चित्त प्रसन्न

श्रीकंठ सिंह बोले, “बहुत प्रसन्न है, पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा है?”

आनंदी की त्योरी चढ़ गई। झंझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी। वह बोली, “जिसने तमसे यह आग लगाई है, उसे पाऊँ तो मुँह झुलस दूं।”

“इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो कहो।”

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“क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है, नहीं तो एक गँवार छोकरा, जिसको चपरासी-गिरी करने की भी अक्ल नहीं, मझे खड़ाऊँ से मारकर यो न अकड़ता।”

“यह हाल साफ़-साफ़ कहो तो मालूम हो। मुझे तो कुछ भी पता नहीं।”

“परसों तुम्हारे लाडले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हाड़ा में पावभर से अधिक नहीं था। वह सब मैंने मांस डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा, ‘दाल में घी क्यों नहीं है? बस, इस पर वह मेरे मैके को भी भला-बुरा कहने लगा। मुझसे रहा न गया। मैंने कहा कि वहाँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते है और किसी को जान

वहाँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते है और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी-सी बात पर उस अन्यायी ने मुझ पर खड़ाऊ फेक मारा। यदि हाथ सनराक लेता तो सिर फट जाता। उसी से पछो मैंने जो कहा, वह सच है या झूठ।”

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श्रीकंठ की आँखें लाल हो गई। वे बोले, “यहाँ तक हो गया उस छोकरे का साहस!”

आनंदी स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी, क्योकि आँसू उनकी पलकों पर रहते हैं। श्रीकंठ धैर्यवान और शांत पुरुष थे। उन्हें कदाचित ही क्रोध आता था, पर स्त्रियों के आंसू पुरुषों को क्रोधाग्नि भड़काने में घी का काम देते हैं। रात-भर करवर बदलते रहे। उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रातःकाल अपने बाप के पास जाकर बोले, “दादा. अब इस पार मेरा निर्वाह नहीं होगा।”

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इस तरह की विद्रोहपूर्ण बाते कहने पर श्रीकंठ सिंह ने कितनी ही बार अपने कई मित्रों को आड़े हाथों लिया था, परंतु दुर्भाग्य से आज उन्हें स्वयं वे ही बाते अपने मुँह से कहनी पड़ी। दूसरों को उपदेश देना कितना सहज है!

बेनीमाधव सिंह घबरा उठे और बोले, “क्यों?”

श्रीकंठ सिंह बोले, “इसलिए कि मुझे भी अपनी प्रतिष्ठा का कुछ ख्याल है। आपके घर में अब अन्याय और हठ का प्रकोप हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर-सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा, घर पर रहता नहीं। मेरे पीछे स्त्री पर खड़ाऊँ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़वी बात तक ही हो तो चिंता नहीं। कोई एक की दो कह ले, वहाँ तक मैं सह सकता हूँ। किंतु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात-घूसे पड़ें और मैं मुँह न खोलूँ।”

बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न दे सके। श्रीकंठ सिंह सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देखकर बूढ़ा ठाकुर अवाक रह गया। केवल इतना ही बोला, “बेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो? स्त्रियाँ इसी तरह घर का नाश कर देती है। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं।”

श्रीकंठ सिंह ने उत्तर दिया, “इतना में जानता हूँ। आपके आशीर्वाद से ऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वये जानते हैं कि मेरे ही समझाने-बुझाने से, इसी गाँव में कई घर सँभल गए। पर जिस स्त्री की मान-प्रतिष्ठा का मैं ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता हूँ, उसके प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत व्यवहार मुझे असह्य है। आप सच मानिए, मेरे लिए यही कुछ कम नहीं है कि । लालबिहारी को कुछ दंड नहीं दिया।”

अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाए। ऐसी बात और न सुन सके। इसलिए बोले, “लालबिहारी तुम्हारा भाई है। उससे जब । कभी चूक हो, उसके कान पकड़ो लेकिन……..”

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“लालबिहारी को मैं अपना भाई नहीं समझता।” “स्त्री के पीछे?” “जी नहीं, उसकी क्रूरता और अविवेक के कारण।”

दोनों कुछ देर चुप रहे। ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यह नहीं स्वीकार करना चाहते थे । कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। इसी बीच में गाँव के और कई सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने वहा आ बला कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ सिंह पत्नी के पीछे पिता से लड़ने पर तैयार है तो उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। दोनों पक्षों का मधुर वाणियां सुनने के लिए उनकी आत्माएँ अकुलाने लगीं। गाँव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इस कुल की नीतिपूर्ण। गति पर मन-ही-मन जलते थे। इन महानुभावों की शुभकामनाएँ आज पूरी होती दिखाई दीं। कोई हुक्का पीने और कोई लगान की रसीद दिखाने के बहाने आकर बैठ गया।

बेनीमाधव सिंह पुराने आदमी थे। इन भावों को ताड़ गए। उन्होंने निश्चय किया कि चाहे कुछ भी क्यों न हो, इन। वेषियों को ताली बजाने का अवसर न दूंगा। तुरंत कोमल शब्दों में बोले, “बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ। तुम्हारा जी जो चाह करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया।”

इलाहाबाद का अनुभव-रहित झल्लाया हआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग क्लब म अपना बात पर अड़ने की आदत थी, इन हथकंडों की उसे क्या खबर? बाप ने जिस मतलब से बात पलटी थी, वह उसका समझ मन आया। वह बोला, “मैं लालबिहारी के साथ अब इस घर में नहीं रह सकता।”

बेनीमाधव सिंह ने पुचकारा, “बेटा, बुद्धिमान लोग मूरों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है। उससे जो कुछ भूल हुई, उसे तुम बड़े होने के कारण क्षमा करो।”

श्रीकंठ सिंह को आवेश आ गया और बोला, “उसकी इस दुष्टता को मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वह घर में रहेगा या मैं। आपको यदि वह अधिक प्यारा है तो मुझे विदा कीजिए। मैं अपना भार सँभाल लूंगा। यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, जहाँ चाहे चला जाए। बस, यह मेरा अंतिम निश्चय है।”

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लालाबहारा दरवाज का चोखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह श्रीकंठ का बहुत आदर करता था। उसे कभी इतना साहस नहीं हुआ था कि श्रीकंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाए, हुक्का पीले या पान खा ले। बाप का भी वह इतना लिहाज न करता था जितना बड़े भाई का। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक स्नेह था। अपने होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब वह इलाहाबाद से आते तो उसके लिए कोई-न-कोई वस्तु अवश्य लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंने बनवा दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से ड्योढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल में पछाड़ दिया तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जाकर उसे गले से लगा लिया था और पाँच रुपए के पैसे लुटाए थे।

___ ऐसे भाई के मुँह से आज ऐसी हृदय विदारक बातें सुनकर लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई। वह फूट-फूटकर रोने लगा। इसमे संदेह नहीं कि अपने किए पर वह पछता रहा था। भाई के आने के एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखू भैया क्या कहते हैं? मैं उनके सम्मुख कैसे जाऊँगा? उनसे कैसे बोलूंगा? मेरी आँखें उनके सामने कैसे उठेगी? उसने समझा था कि भैया मुझे बुलाकर समझा देंगे। इस आशा के विपरीत आज उसने उन्हें कठोरता की मूर्ति बने हुए पाया। वह मूर्ख था, परंतु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। यदि श्रीकंठ सिंह उसे अकेले में बुलाकर दो-चार कड़वी बातें कह देते, इतना ही नहीं दो-चार तमाचे भी लगा देते तो कदाचित उसे इतना दुःख न होता, पर भाई का यह कहना कि अब में इसकी सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया। वह राता हुआ घर में आया। कोठरी में जाकर कपड़े पहने, आँखें पोछी, जिससे कोई यह न समझे कि वह रो रहा था। इसके उपरांत वह आनंदी के द्वार पर आकर बोला, “भाभी, भैया का निश्चय है कि वे मेरे साथ इस घर में नहीं रहेंगे। अब वे मेरा मुँह नहीं देखना चाहते, इसलिए मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह नहीं दिखाऊँगा। मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा करना।” यह कहते-कहते लालबिहारी का गला भर आया।

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जिस समय लालबिहारी सिर झुकाए आनंदी के द्वार पर खड़ा था, उसी समय श्रीकंठ सिंह भी आँखें लाल किए बाहर से आए। भाई को खड़ा देखा तो घृणा से आँखें फेर ली और कतराकर निकल गए, मानो उसकी परछाईं से भी दूर भागना चाहते हैं।

आनंदी ने लालबिहारी की शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही थी। वह स्वभाव से ही दयालु थी। उसे इसका तनिक भी ध्यान नहीं था कि बात इतनी बढ़ जाएगी। वह मन में अपने पति पर झुंझला रही थी कि ये इतने गरम क्यों होते। हैं। जब उसने लालबिहारी को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता हूँ, मुझसे जो कुछ अपराध हुआ है उसे क्षमा करना तो उसका रहा-सहा क्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का मेल धान के लिए नयन-जल से उपयुक्त और कोई। वस्तु नहीं है। श्रीकंठ को देखकर आनंदी ने कहा, “लाल बाहर खड़े बहुत रो रहे थे।” “तो मैं क्या करूँ?” “भीतर बुला लो। मेरी जीभ में आग लगे! मैंने कहाँ से यह झगड़ा उठाया!” “मैं नहीं बुलाऊँगा।” “पछताओगे! उन्हें बहुत ग्लानि हो गई है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।” श्रीकंठ सिंह न उठे। इतने में लालबिहारी ने फिर से कहा, “भाभी, भैया से मेरा प्रणाम कह दो। वे मेरा मुँह नहीं देखना चाहते, इसलिए मैं अपना मुँह उन्हें नहीं दिखाऊँगा।” लालबिहारी इतना कहकर लौट पड़ा और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा। अंत में आनंदी कमरे से निकली और। उसका हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे मुड़कर देखा और आँखों में आँसू भर बोला, “मुझे जाने दो।”

“कहाँ जा रहे हो?” “जहाँ कोई मेरा मुँह न देखे।” “मैं न जाने दूंगी।” “मैं तुम लोगों के साथ रहने योग्य नहीं हूँ।” “तुम्हें मेरी सौगंध, अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।”

“जब तक मुझे यह न मालूम हो जाए कि भैया का मन मेरी तरफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न रहूँगा।”

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श्रीकंठ सिंह का हृदय भी पिघला। उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले से लगा लिया। दोनों भाई खूब फूटफूटकर रोए। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा, “भैया, अब कभी मत कहिएगा कि तुम्हारा मुँह न देखूगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, में सहर्ष स्वीकार करूँगा।”

श्रीकंठ ने कॉपते हुए स्वर में कहा, “लल्लू! इन बातों को बिलकुल भूल जाओ। ईश्वर चाहेगा तो फिर ऐसा अवसर नहीं । आएगा।” बेनीमाधव सिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकित हो गए और बोल उठ, “बड़े घर की बेटियाँ ऐसी ही होती हैं, बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।” गाँव में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा- “बड़े घर की बेटियां ऐसा हो होती हैं।”

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